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Friday, October 20, 2017

तुम्हारे केश,तुम्हारी आज़ादी

वो जो गिरती है तो बड़ी शान से
जो लहराये हवाओं में जैसे अंगड़ाइयाँ लेती है
कभी उलझती भी है पर सुलझ भी जाती है
एक बेफिक्री सी है उसमें
तुमसी ही है पर तुम नहीं
हाँ,मैं तुम्हारे केशुओं की बात कर रहा हूँ
हाँ उन्ही केशुओं की जिन्हें तुम
अपनी उँगलियों से कभी इधर
कभी उधर करती हो
जैसे लोग कोशिश करते हैं
चित्र-गूगल आभार 
तुम्हारे साथ करने की
पर देखो तो,वो तो आदत से मजबूर हैं
एक जगह उन्हें टिकना कहाँ आया
बिल्कुल तुम्हारी तरह
आज़ादी उन्हें भी खूब पसंद आती है
इसीलिए तो मैं कहता हूँ
इन्हें खुले ही रहने दो
ये तुम्हारी आज़ादी जतलाते हैं
जो कोई तुम्हें टोकना चाहे
इशारा कर देना अपने केशुओं की ओर
ये ही तो नुमाइंदगी करेंगे
हाँ लहरा कर,कि तुम आज़ाद हो
हाँ, किसी की रोक किसी की टोक
का बस कहाँ चलता है
जब एक झोंका खुद पर भरोसे का चलता है
जब कभी हौंसला कम पड़े न
एक बार देख लेना इन केशुओं को
एक मुस्कान सी आएगी
और एक चमक सी चेहरे पर
कुछ कर गुजरने की
हाँ, तब भी भले मैं इन केशुओं की बात करूँ
पर लोग हाँ यही लोग बस तुम्हारी बात करेंगे
बात तुम्हारी हुनर की,तुम्हारी काबिलियत की
जानता हूँ रंग रूप की तारीफ पसंद है तुम्हे
पर एक बार चिढ़ना भी होता होगा
की क्या इस से परे भी मैं कोई हूँ
अरे! बिल्कुल हो
और वो तारीफ अलग होगी
जो तुम्हारे जज़्बे को सलाम करेगी
इसलिए अपने केशुओं की तरह
ऐसे ही आज़ाद रहना
और ये मैं कह रहा हूँ
मैं जो तुम्हें चाहने वाला नहीं हूँ
बल्कि तुम्हें मानने वाला हूँ।
©युगेश
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