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Friday, November 22, 2013

रजनी ! उसकी याद

कैसे कहूँ मैं ओ रजनी
उसकी याद कितना मुझे सताती है
जो  होता हूँ मैं तेरे संग
वो आँखों से बह जाती है/
                                          उसके आने के पहले
                                          मेरी गुलशन तुझसे रही
                                          और उसके आने पर भी
                                          तू ही तो बस पास रही /
मेरे सुने  उपवन में बजनेवाली उस पायल की
पहली झंकार कि तू ही तो साक्षी थी
मुझे मिली वो तेरी सौतन
 जिसकी तू अभिलाषी थी  /
                                          उस मधुर क्षण में साथ हमारे
                                          तेरा ही तो साया था
                                          रौशन हुई थी तू उस पल
                                         जो दिखा वो खूबसूरत साया था /
तूने सोचा होगा शायद
अब मैं तुझसे दूर हुआ
पर देख तेरे ही साये में
इस जोड़े को नूर मिला /
                                         याद है वो क्षण
                                         जो मैं उससे मिला था
                                         तू भी तो हरषाई थी
                                        और चाँद पूरा खिला था /
तू ऊपर से हमें देख रही थी                                  
जाने क्या खेल खेल रही थी
और नज़रें उनसे टकरायी थी
दुनिया स्थिर हमने पाई थी /
                                          मयस्सर मुझको वो हो
                                          बस केवल उसको पाना था
                                          इस प्रेम रूपी मदिरा का साकी
                                          वो पहला ही पैमाना था/
और धीरे-धीरे क्षण बीते थे
हम अक्सर ही मिल जाया करते थे
पहले तो ये संयोग हुआ
फिर मानो एक रोग हुआ /
                                         फिर वो पल भी आया था
                                         तेरा रूप सलोना पाया था
                                         मैं बातें उससे कह पाया था
                                         पाकर उसको मैं जी पाया था /
रजनी तू फिर रही पास
जो बँधा ये परिणय सूत्र खास
एक अध्याय नया फिर शुरू हुआ
मेरा सूनापन मनो दूर हुआ /
                                         खुशियों के कुछ ही पल बीते थे
                                         बरसात के शायद छींटे थे
                                         शायद उनको बेह जाना था
                                         हांथों से निकल फिर जाना था /
उस दिन तू बिलकुल काली थी
तू डरती जिससे वो वो लाली थी
दिल मेरा घबराया था
और अनहोनी का साया था /
                                         मैं जीवन से बिलकुल रूठा था
                                         मैं तो बिलकुल टुटा था
                                         और मानो एक ठेस मिला
                                         पर जीने को उद्देश्य मिला/
और उसकी निशानी मुझको जो
पापा कहके बुलाती है
वरना उसकी याद तो मुझको
हर एक क्षण तड़पाती है /
                                        और कैसे कहूं मैं ओ रजनी
                                        उसकी याद कितना मुझे तड़पाती है
                                        जो होता हूँ मैं तेरे संग 
                                        वो आँखों से बेह जाती है/

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Thursday, September 19, 2013

रेलवे टिकट

 बीते दिन थे कई
जब से होकर आया मैं घर
छुट्टी हुई थी कॉलेज में
मैं भागे-भागे पहुँचा रेलवे टिकट-घर
भीड़ बरी थी टिकेट-घर में
आठ में से खिड़कियाँ खुली थी केवल छह
पीछे मुड़ा था मैं क्यूँकि
वहाँ लिखा था भारत माता की जय
ट्रेन एक घंटे में थी
लाइनें लम्बी बड़ी थी
भीड़ देखकर लगा मानो
हमारी छुट्टी  अधर में लटकी पड़ी थी
पर फिर भी मैंने हिम्मत जुटाया
एक उम्मीद भरी लम्बी सांस लेकर
हमने भी अपनी उपस्तिथि को
सामने वाली लाइन में दर्ज कराया
भीड़ बड़ी थी सो
लाइन धीरे-धीरे चल रही थी
पर तखलीफ़ तो इस बात की थी
की आगे घुसपैठ चल रही थी
मैंने ज्यों ही आवाज़ उठाने को
अपनी आँखें तरेरी
सामने लगी पट्टी पर
मेरी नज़र पड़ी
अब घंटा बचा था आधा और
पट्टी पर लिखा था महिलाएँ एवं बुजुर्ग
अब तो हमारी हालत ऐसी थी
मनो मोर के झुण्ड में सुतुरमुर्ग
तब मैंने आगे और पीछे वालों को टटोला
उद्देश्य गलत न था
आगे-पीछे पुरुष ही खड़े थे
मैं तो सही लाइन में ही घुस था
फिर मैंने सोचा
अब क्या करूँ
खैर ! इतनो को फर्क नहीं पड़ता
तो मैं क्यूँ डरूं
फिर कानों में एक मीठी सी आवाज़ आई
पीछे मुड़ा तो देखा
एक खुबसूरत लड़की खड़ी थी
उसने कहा मेरे लिए एक
टिकट ले दीजियेगा
मेरा जवाब तो जग-जाहिर है
पर फिर भी हमने अपनी उत्तेजना को दबाया
और,धीरे से कहा - "ठीक है"
अब तक तो सब ठीक था
पर आगे मुड़ कर देखा तो
स्तिथि अजीब थी
आगे तो द्वंद चल रहा था
एक स्त्री लाइन में घुस रही थी
और एक पुरुष उसे रोक रहा था/
स्त्री ने कहा - ये महिलाओं की लाइन है
उत्तर आया बहुत देर से खड़े हैं
तभी हवालदारजी आ धमके
और कहा -  औरत हो या बूढ़े हो ?
व्यक्ति स्तब्ध था- न बोले तो टिकेट जाये
और हाँ बोले तो पुरुषार्थ  जाये /
उसके पीछे मैं ही खड़ा था
ट्रेलर देख मैं तो पहले ही डरा था
गृह-प्रेम छोड़ मैंने अपने पुरुषार्थ को गले लगाया
और लाइन छोड़ मैं तो निकल आया
अब तो देर बड़ी थी पर खुसी हुई मुझे
क्यूंकि ! अब वह लड़की लाइन में खड़ी थी/
मैंने पास जाकर पूछा -
मेरी टिकेट ले दीजिएगा /
उत्तर आया -"आमि  पटना जाक्षी /"
मैंने कहा-" आमि चन्द्रपुरा "/
पर सायद कुछ ग़लतफ़हमी थी
जो उसने कहा वह वो न कहकर
कुछ और कहना चाहती थी/
मैंने खुद को संभाला कहा कुछ
समझिये फिर कुछ कहिये
मुझ पर मनो पहाड़ सा टूट पड़ा
मेरे घर जाने के कार्यक्रम को गहरा झटका लगा
फिर अंतर-आत्मा  से आवाज़ आई/
कहा- बेटा ! बेटिकट कर ट्रेन पर चढाई/
बसते को कंधे पर टाँगकर
मैंने प्लेटफार्म पर कदम जमाया
इतनी परेशानी के बाद
कुछ तो अच्छा दिखे मैंने
चारो तरफ नज़र घुमाया
पर आज तो दिन ही बुरा था
इधर-उधर देखा तो
दो-चार काले कोर्ट वाला पशु
यहाँ वहां विचरण कर रहा था /
बस फिर क्या मेरे गृह-प्रेम
पर फिर ग्रहण लग गया
और बस्ता उठाकर मैं
फिर लाइन में लग गया/
ट्रेन अब तक  स्टेशन पर आ चुकी थी
मैं टिकटघर तक पहुँच ही चूका था /
पर मेरी दुहाई काम न आई,
इधर टिकेट कटी और उधर ट्रेन ने की चढाई/
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Tuesday, August 6, 2013

शिक़ायत नहीं होती

                                       
गुस्ताख़ रही मेरी नज़रें 
तो शिकायत आपको रही /
भला आपके हुस्न के फिदरत कि 
शिकायत हमने की है कभी/
कि  बड़ी तल्क है आपकी नज़रें 
गिरती हैं शोले बनकर 
और दिल कहता है 
शिकायत नहीं होती /
कि  इस छरहरी काया के फाँस 
से छुटना आसन नही होता /
पर फिर भी देखो तो हमारा धैर्य 
कि शिकायत नहीं होती/
इतना होता तो शायद झेल भी जाता 
पर तेरी मीठी बोली रातों को 
सोने नहीं देती/
पर फिर भी दिल कहता है 
शिकायत  नहीं होती/
तेरा हौले-हौले चलना 
साँसों को रोक सा देता है/
और कमबख्त  दिल कहता है 
काश! साँसों की ज़रूरत न होती/
पर फिर भी मुझे शिकायत न होती/
और माफ़ करना अगर 
गुस्ताख रही मेरी नज़रें 
पर क्या करूँ तुम्हे देख कर 
ये भी जवान हो उठती हैं/
दुरुस्त कर देना चाहता हूँ एक बात 
की खुदा को मानने वाला हूँ 
और उसकी कारीगिरी की इनायत
 न करने की हिमाकत न होती/
बस इस कारण ही तू लाख शिकायत कर ले 
पर इस दिल को तुझसे शिकायत न होती /

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Sunday, May 5, 2013

ये ज़ाम प्रिये

उनसे दूर कहीं मैं इस कमरे में
बैठा लेकर ज़ाम
पर जाने क्यूँ दिल को कचोटता
बस वो प्यारा सा नाम /
हाँथों में ये ज़ाम लिए
बस भली सुबह की आस प्रिये
तू तो मेरी जान रही
अब मैं तेरे बिन बेजान प्रिये /
जान जानकर तुझको जो
प्रस्फुटित वो प्यार प्रिये
तू जो मेरे साथ रही
मैं जीता दिल को हार प्रिये /
जो मैं तुझसे लड़ता हूँ
ये तकरार नहीं है प्यार प्रिये
जो न होंठों से टकराती बाँसुरी
क्या  रहता कोई संगीत प्रिये /
बस कुछ समय की बात रही
मैं देता खुद को आस प्रिये
बस इस कारन ही हाँथों में है
ये छोटा सा जाम प्रिये /
बस इस कारन ही हाँथों में है
ये छोटा सा जाम प्रिये /




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Thursday, April 25, 2013

जीना इसी का नाम है

दोस्तों ,लोग कहते जीवन जीना कठिन है /पर मेरा मानना  है कि जीवन अपने मुताबिक  जी पाना कठिन है/हर चीज़ आपके अनुसार नहीं हो सकती/आप हर कुछ और हर किसी को पा नहीं सकते /ऐसे में व्यक्ति खुद को अकेला महसूस करने लगता है और  त्रस्त होकर दिल से आवाज़ आती है -
                                        "हाल अपना क्या बताऊँ
                                          बात कुछ ख़ास नहीं
                                         आगे पड़ी है ज़िन्दगी
                                         पर उससे कोई आस नहीं /"
 मेरा मानना है की जीवन जीना भी एक कला है /यह आप पर निर्भर करता है की आप अपने जीवन रूपी चित्र को हरा-भरा कर दें या फिर उसे उष्ण रँगों की तपिश में झोंक दें /जीवन के इन्हीं उसूलों को समेटे हुए है मेरी ये  कविता -
                                       "जीना इसी का नाम है "
कठिन है यह ज़िन्दगी
जीना भी एक कला है
ज़िन्दगी कि इस कशमकश में
हर बार कोई न कोई जला है /

 बचपन की दोस्ती नज़दीकियाँ
 दूरियों में बदल जाती हैं
 अँधेरा क्या छाता है
 परछाईयाँ दगा दे जाती हैं /

टूटता है विश्वास तो
चनक सी सीने में होती है
यूँ तो पोंछ लेते हैं हम आँसूवों को
पर वह जख्म तो सदा हरी होती है /

मतलबपरस्तों से भरी है ये दुनिया
इस मतलब को समझ लेना है
करोडों की भीड़ में
तू तो बस एक छोटा सा खिलौना है /

टूटने पर टूटना नहीं
छुटने पर छुटना नहीं
मिल जायेंगे अपने लाखों यहाँ
बस आँखों को अपने मूंदना नहीं /

आँखें खुली रखना,बाहें फैलाये रखना
छलकनी चहिये  खुसी चेहरे से
क्यूँकि  यही तो ज़िन्दगी का जाम है
आखिर जीना इसी का नाम है/
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Saturday, April 6, 2013

तुझे क्या पता ये वक़्त


तुझे क्या पता ये वक़्त
हमने कैसे बिताया था/
कि पगडंडी पर पड़ा हर एक काँटा
हमने अपने पैरों तले पाया था/
कि तेरे साथ बिताए लम्हों के पत्ते
अब सूख चले थे/       
कि तू आएगा यादों की नई बसंत लेकर
ये सोच हमने उन्हे अब तक संजोया था/
कि तेरी वो सुखी नजमें अब भी
मेरे ज़हन मे ज़िंदा हैं/
कि तेरे ये मुरझाए खत
आज भी मुझे सोने नहीं देते/
ठीक कहा तूने सुख गयी थी मेरे पलकों की नमी
जो क्षण कुछ और हो जाते तो शायद देख नही पाती/
कि समेट ले मुझे अपनी आगोश मे
कि कब से इस क्षण को जीने के लिए हर पल मरी हूँ/
कि बुझ ना पाएगी प्यार की ये लौ
आख़िर इतना कुछ खोकर तुझे पाया है हमने/
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Thursday, March 14, 2013

महँगाई और होली


                                 मत पूछो ये कैसी उमंग
                                 ये कैसी चेहरे की लाली
                                 अपने रंगो में रंगने को
                                 देखो फिर आई होली मतवाली/
जी,हाँ / अब कुछ ही दीनो में होली आ जाएगी,पर इस बार की होली हर बार की तरह ना होगी आखिर महँगाई जो इतनी  बढ़ गयी है / सो मैने होली को आम आदमी से जोड़ कर देखा /एक  सच्चे आम आदमी की होली दो मोहनों के बीच मे फँस गयी है / पहला ब्रज के मोहन और दूसरा मनमोहन / भई!महँगाई का हाल ये है की बज़ट में बस होली का होल रह गया है /ई मनमोहन अपने ब्रज ले गये हैं और सोनिया जी को सुपुर्द कर दिया है / तो इस पर लिखने से मैं खुद को रोक ना पाया तो ऐसी हालत है आम आदमी की इस होली में ------
                             महँगाई और होली
घर पर यूँ बैठे-बैठे मैने
ज्यों ही मेज़ पर हाथ फिराया था
मुझे मिली वो निमंत्रण पत्रि
जो पिछले वर्ष मैने होली मे छपवाया था/
                                 उस डेढ़ हज़ार के बोनस पर ही
                                 मैने खुद को . राजा सा पाया था
                                 घर मे थी होली-मिलन,और श्रीमति ने
                                 मुझे अच्छे से लुटवाया था/
होली के उपरांत भी मेरी हालत
बिल्कुल  . राजा ही जैसी थी
होली के पहले AC और
और उसके बाद ऐसी की तैसी थी/
                                 जब-जब चाहा उनलोगों ने
                                 तब-तब डटकर खाया था
                                 जबकि उनको था मालूम मुझपर
                                 बनिए का बकाया था/
दिखावे के उस पंख से
मैने भी खुद को सहलाया था
पर अब बटुवा साथ ना देता
मैने श्रीमति को समझाया था/
                                 मेरी प्रियतमा भी बिल्कुल
                                 ममताजी से कम नहीं
                                 मैने कहा प्राणप्रिए गुस्सा करना
                                 शायद पत्नी-धर्म नहीं/
धर्म-कर्म मुझे ना समझाओ
क्या तुमको इसका मर्म नहीं
अरे! पत्नी को खुश रखना
क्या पति का धर्म नहीं/
                                घर पर थी भीषण लहरी
                                बाहर महँगाई का ज़ाडा था
                                शादी से पहली उसकी खूबसूरती
                                अब उसके तर्क-वितर्क से हरा था/
बाज़ार जाकर मैने जो
बज़ट का हाल पाया था
सच कहता हूँ होली का वो लाल रंग
मेरी आँखों मे उतर आया था/
                                अगर यही रही महँगाई तो
                                प्रभु! मैं भी तेरी शरण मे आऊँगा
                                छोड़ इस मोह-माया को देखना
                                मैं भी सन्यासी बन जाऊँगा/

                                                                              
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Saturday, March 9, 2013

सच्चाई या माया


है ओत-प्रोत ये मन मेरा
कितनी सुंदर तेरी काया
हुआ अच्छम्भित मन मेरा
तू सच्चाई या कोई माया
                     नशें में हूँ पर मत समझ
                     ये नशा है उस प्याले का
                     उसका असर हम पे क्या हो
                     जो दीवाना महखाने का
ये नशा तो है तेरा प्रिये
जिसने ये जादू कर डाला
थी छुईमुई शरमाई तू   
जो डाली मैने बैयाँमला
                     बात ये मैने मानी थी
                     पर टूट गया मेरा वादा
                     हुआ असर था तुझ पर भी
                     पर हुआ नशा मुझको ज़्यादा
मधुर नशीला था वह क्षण
तू समाई मेरे आलिंगन मे
एहसास हुआ था कण-कण
पुस्प खिले हृदय आँगन मे
                      उस दूर क्षितिज तक मैने
                      खुद को अकेला पाया था
                      जो क्षीर हुआ मेरे जिस्म से
                      वो तेरा कोमल साया था
पर देख मैं जीता हूँ
की तू कल फिर मिलने आएगी
देख रुधिर से मेरे ही
माँग तेरी सज पाएगी
                      कहने दो जो कहता है
                      रोष नहीं उससे कोई
                      वो बेचारा क्या जाने
                      प्यार से सच्चा है कोई
हुआ कण-कण मेरा तेरा
ये बोल नहीं सच्चाई है
है खुदा गवाह मेरा जब
जब तेरी माँग सजाई है
                      हुआ सरस जीवन मेरा
                      ये साथ जो सच्चा पाया है
                      है अच्छंभित मन मेरा
                      तू सच्चाई या माया है 
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Wednesday, March 6, 2013

माँ



विरह होकर इस जग से 
आज कक्ष मे अपने बैठा हूँ
भोग-विलास के साधन पास है मेरे
पर माँ क्यूँ मैं तेरे आँचल को रोता हूँ
                                 गिरता,संभलता,बुदबुदाता
                                 मैं आगे को बढ़ता जाता था
                                 माँ तेरे साए मे आकर 
                                 चैन मुझे मिल पाता था/
माँ मैं जो कुछ भी कहता
शायद ही कोई समझता था
जाने क्या शक्ति पाई थी तूने 
जो मैं बिन बोले कह पता था/
                                 माँ आज मैं बोलने मे सक्षम हूँ
                                 पर क्यूँ खुद को व्यक्त कर पाया हूँ
                                 माँ तूने तो मुझे बिन बोले समझा पर
                                 बोल-बोलकर भी मैं जग को समझा पाया हूँ/
जब सारी दुनिया लड़ती थी 
और विषम परिस्तिथि लगती थी 
माँ आँचल मे अपने लेकर
तू मेरी सखी बन जाती थी/
                                 दुनिया आज भी मुझसे लड़ती है
                                 पर क्यूँ प्रतिरोध करने को जी नही करता है
                                 यूँ तो दोस्त हैं आज कई मेरे 
                                 पर शायद ही कोई तुझसी सखी बन पता है/
मैं चलने की कोशिश करता था
पर हर कदम पर लड़खड़ाता था
बस तेरी ही उंगली थामकर मैं
आगे को बढ़ पता था/
                                 माँ आज मैं चल रहा हूँ
                                 या शायद भाग रहा हूँ 
                                 पऱ क्यूँ आज फिर लड़खड़ाने को जी चाहता है
                                 क्यूँ तेरी उँगली फिर थमने को जी चाहता है/
याद है मुझको माँ 
जब तू खीर बनाती थी
ज़िद करता था मैं    
तू अपनी थाल बढ़ाती थी/
                                  भूख नहीं मुझको बेटा 
                                  कहके तू मुस्काती थी
                                  सोच-सोच के मैं हारा था 
                                  ये भूख तूने क्या पाई थी/          
आज पड़े हैं छप्पन-भोग यहाँ
पर क्यूँ खाने को जी नहीं करता है
माँ तेरे बच्चे ने ज़िद करना छोड़ दिया 
क्योंकि कोई अपनी थाल नहीं बढ़ाता है/
                                  माँ मैं तुझसे भागा करता था
                                  मैं तुझसे रूठा करता था 
                                  जो तू बढ़ती थी आगे
                                  लगाने को मेरे माथे पर वो काजल/
पर क्यूँ आज कमी खल रही मुझको 
जो ओझल होता माथे का वो काजल
माँ शायद पतझड़ ये दुनिया सारी 
माँ सावन तेरा आँचल    
                                  तेरी हर वो बात माँ
                                  आज प्रत्यक्ष सी प्रतीत होती है
                                  हाथों मे है गुलाब पर
                                  काँटों से टीस सी होती है
तेरी उन बातों का आशय माँ
आज समझ मे आया है
माँ तेरे आँचल से बढ़कर
क्या जग मे दूसरा कोई साया है
                                  मेरे हर सुख से तेरी खुशी थी 
                                  मेरे हर गम से तेरी नाराज़गी थी
                                  मुझको शीतल करने को तेरी परछाई थी
                                  तेरी दुनिया मुझमे ही समाई थी
मैं हंसता था,तू भी हँसती थी
मैं रोता था,तू भी समझाती थी
माँ आज मैं हंसता हूँ,क्या तू भी हँसती है
माँ आज मैं रोता हूँ,क्या तू भी  रोती है
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