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Sunday, October 30, 2016

पुल और प्रेम

"तू किसी रेल सी गुजरती है 
 मैं किसी पुल सा थरथराता हूँ।"
दुष्यंत कुमार की ये पंक्तियाँ है,बड़े ही आसान शब्दों में प्रेम की बारीकियों को रखा गया है।आपने फिल्म मसान में इस गाने को सुना होगा।अगर इन पंक्तियों को ध्यान से पढ़ा जाये तो आपको एक पुल और प्रेम में कई समानताएं मिलेंगी।जैसे दो छोर को जोड़ता है एक पुल ठीक उसी प्रकार ईश्वर की दो भिन्न कृति दो छोर यानि स्त्री और पुरुष को जोड़ता है प्रेम।प्रेम जो निरंतर होता है,असीम होता है,खूबसूरत होता है और बेहद होता है........


पुल और प्रेम
भावों के पुलिन्दों से बाँध कर रखा था
चित्र-गूगल आभार 
प्यार का वो पूल हमारा
जिसके एक छोर पर तुम थी
और दूसरे छोर पर मैं
जैसे जोड़ती है दो किनारों को एक पूल
वैसे हमें भी जोड़ रखा था
तुम्हारी प्यारी आँखों को तकती मेरी आँखें
तुम्हे आग़ोश में लिए मेरी बाहें
जब गुजरती है खूबसूरत वादियों से
अच्छा लगता है
इन ख़ामोशियों में तुमसे जुड़ना
अच्छा लगता है
जो बत्तियों से सजा दिए जाते हैं
किसी उत्सव में पूल कई
वैसे तुम संग सजना अच्छा लगता है
हर रंग में तेरा जच्चना अच्छा लगता है
जैसे थरथराती है भार से पुल
वैसे प्यार पर समय की मार भी
अच्छा लगता है
पर एक फर्क है
जिसे अनदेखा नही कर सकता
ये पुल दो छोर को बांधे हुए
चंद सालों का है या उस से आगे
पर ये जो प्यार है हमें जोड़े हुए
ये निरंतर है,असीम है
खूबसूरत है ,बेहद है
और ये पुल अच्छा लगता है
हमारा प्यार और भी अच्छा लगता है।


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