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Sunday, August 30, 2015

तो शायद प्यार ना होता

बड़ा मुश्किल है कहना
पर वो बोल रही थी
जो इतना आसान होता
तो शायद प्यार ना होता/
मुक़र्रर की थी मैंने
अगले हफ्ते की तारीख़
इतने दिनों में बोल ना सका
अब कैसे कह जाता/
बहुत हीं  मिन्नतें माँगी
मैंने उस खुदा  से
पर जो जल्दी सुन लेता
तो शायद खुदा न होता /
मैंने पूछा कब मिलोगी
कुछ बिना बोले हंस कर भाग गई
बस यही अनकहीं बातें तो हैं
वरना इंतज़ार पर ऐतबार न होता /
उसने पूछा मुझसे प्यार क्यों हुआ
मैंने कहा तुम्हे देखा तुम्हे समझा
महसूस किया,जो एकबार में हो जाता
तो शायद प्यार न होता/
वो बोल उठी बहुत बातें बनाते हो
मैंने कहा इन बातों में तुम ही तो होती हो
जो तुम ना होती
तो शायद ये बातें ना होती/
बस शर्मा उठी वो
मैंने हौले से हाँथों को पकड़ा
जो ये मासूमियत ना होती
तो शायद प्यार पर ऐतबार ना होता/

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