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Tuesday, August 6, 2013

शिक़ायत नहीं होती

                                       
गुस्ताख़ रही मेरी नज़रें 
तो शिकायत आपको रही /
भला आपके हुस्न के फिदरत कि 
शिकायत हमने की है कभी/
कि  बड़ी तल्क है आपकी नज़रें 
गिरती हैं शोले बनकर 
और दिल कहता है 
शिकायत नहीं होती /
कि  इस छरहरी काया के फाँस 
से छुटना आसन नही होता /
पर फिर भी देखो तो हमारा धैर्य 
कि शिकायत नहीं होती/
इतना होता तो शायद झेल भी जाता 
पर तेरी मीठी बोली रातों को 
सोने नहीं देती/
पर फिर भी दिल कहता है 
शिकायत  नहीं होती/
तेरा हौले-हौले चलना 
साँसों को रोक सा देता है/
और कमबख्त  दिल कहता है 
काश! साँसों की ज़रूरत न होती/
पर फिर भी मुझे शिकायत न होती/
और माफ़ करना अगर 
गुस्ताख रही मेरी नज़रें 
पर क्या करूँ तुम्हे देख कर 
ये भी जवान हो उठती हैं/
दुरुस्त कर देना चाहता हूँ एक बात 
की खुदा को मानने वाला हूँ 
और उसकी कारीगिरी की इनायत
 न करने की हिमाकत न होती/
बस इस कारण ही तू लाख शिकायत कर ले 
पर इस दिल को तुझसे शिकायत न होती /

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5 comments:

  1. This comment has been removed by the author.

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  2. apki rachnae hame tahe dil se bahoot achi lagi

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  3. बहुत-बहुत शुक्रिया!!

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  4. आपकी कविताए तो हम दीवाने हो गये है यूगेश बाबू

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