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Sunday, May 5, 2013

ये ज़ाम प्रिये

उनसे दूर कहीं मैं इस कमरे में
बैठा लेकर ज़ाम
पर जाने क्यूँ दिल को कचोटता
बस वो प्यारा सा नाम /
हाँथों में ये ज़ाम लिए
बस भली सुबह की आस प्रिये
तू तो मेरी जान रही
अब मैं तेरे बिन बेजान प्रिये /
जान जानकर तुझको जो
प्रस्फुटित वो प्यार प्रिये
तू जो मेरे साथ रही
मैं जीता दिल को हार प्रिये /
जो मैं तुझसे लड़ता हूँ
ये तकरार नहीं है प्यार प्रिये
जो न होंठों से टकराती बाँसुरी
क्या  रहता कोई संगीत प्रिये /
बस कुछ समय की बात रही
मैं देता खुद को आस प्रिये
बस इस कारन ही हाँथों में है
ये छोटा सा जाम प्रिये /
बस इस कारन ही हाँथों में है
ये छोटा सा जाम प्रिये /




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3 comments:

  1. बहुत अच्छी प्रस्तुति संवेदनशील हृदयस्पर्शी मन के भावों को बहुत गहराई से लिखा है

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  2. जरूरी कार्यो के ब्लॉगजगत से दूर था
    आप तक बहुत दिनों के बाद आ सका हूँ

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  3. आपकी सराहना और मेरे ब्लॉग पर समय देने के लिए बहुत-बहुत धन्यवाद / आगे भी कोशिश करूँगा की अपनी रचनाओं से आपको नीरस ना करूँ /
    आभार

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