Thursday, May 12, 2016

बिटिया

कभी बचपन में बोला था तूने
कब शादी करोगी मेरी
हंसकर बोला मैंने बड़े शौक से

बड़े धूमधाम से जब करनी होगी तब होगी
बचपना था तुम्हारा हंसी थी मेरी
आज खुसी है तेरी और मजबूरी मेरी
तू अब बच्ची न थी और न ही जिद्दी
पर शायद जिद्दी मैं हो गयी थी
एक और नवजीवन था
एक और माँ का अपनापन था
प्यार तो अब भी उतना ही था
पर एकाधिकार नही था
अनायास ही सारा जीवन और 
तेरा प्यारा बचपन आँखों के सामने
मानो दौड़ने सा लगता है
तेरी वो प्यारी हँसी चेहरे पर मुस्कान
आँखों में पानी ले आती है
जब भी लाड़ली मेरी मुझसे पूछती है
माँ याद मेरी आती है
याद बेटी हर दफा हर पल सताती है
ये हरयाली न अब मुझको ही भाती है
तू जो तोड़ लाती थी फूलों को कहीं चुनके
की अब फूलों से न वो खुसबू ही आती है
क्या कर खुसी मिली तुझको विदा करके
की मेरी हर सांस बस तुझको बुलाती है
पर है ये जो नियम सृस्टि का
उसको है वहन करना
पर इस दिल के कण-कण में
होता तेरा होना/

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