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Sunday, October 27, 2019

तूफान चाहिए।

मुझे नहीं कुछ आसान चाहिए
ला सके तो ला, तूफान चाहिए।
हौंसला देख ठहर जाएगा तू
मैं परवाज़ हूँ, आसमान चाहिए।
इन गीदड़-भभकियों से डरता है कौन
शेर हूँ मुझे बस दहाड़ चाहिए।
मिलूँगा निहत्था तुझसे, गुरुर है
जो तोड़ सके १०० तलवार चाहिए।
चित्र - गूगल आभार

भीतर जो मेरे है क्या बताऊँ
मुझे तेरे अंदर थोड़ा पानी चाहिए।
जबीं पर पड़ी सिलवटें, ईमान बोलते हैं
तुझे रास न आएगी, लिख ले, स्याही चाहिए।
शादाब है अब भी कोहसार मेरा
तल्खियाँ नहीं, ख़ारज़ारों की सौगात चाहिए।
तेरी मक्कारियों को नज़रअंदाज़ करते हैं
थोड़े सभ्य हैं, वरना तुझे औकात चाहिए।
असरार मेरे जुनून का तुझे क्या बताऊँ
मैं पानी हूँ, मुझे बस बहाव चाहिए।
©युगेश

परवाज़ - उड़नेवाला
जबीं - ललाट
शादाब - हरा-भरा
कोहसार - पहाड़
ख़ारज़ारों - काँटों भारी ज़मीन
असरार - राज़

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Monday, April 17, 2017

अंतर्द्वन्द

अंतर्द्वन्द जो सीने में बसा
औचित्य जीवन का मैं सोचता
यहाँ हर कोई मुझे पहचानता है
मैं पर खुद में खुद को ढूंढता

साँस चलती हर घड़ी
प्रश्न उतने ही फूटते
जो सपने बनते हैं फ़लक पर
धरा पर आकर टूटते

कुंठित होकर मन मेरा
चित्र-गूगल आभार 
मुझसे है आकर पूछता
जिसने देखे सपने वो कौन था
और कौन तू है ये बता

रो-रो कर मुझसे बोलती है
मानव की ये त्रासदी
वो बनना चाहता है कुछ
और बन निकलता और कोई

कौतुहल विचारों में
एक सैलाब जिसे मैं रोकता
जो हारता न किसी और से है
वो बस स्वयँ से हारता

मझधार में कश्ती हमारी
एक सवाल हमसे पूछती
इस ठौर चलूँ उस ठौर चलूँ
मन को हमारे टटोलती

विचार कर जो एक तो
आज या कल मंज़िल को मैं पाऊँगा
वरना यही मझधार है,कस्ती यही है
शायद अनचाही मंज़िल यही
कल मैं औरों को,खुद को
बस कोसता ही जाऊँगा/
©युगेश
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