संकेत मिलन का क्या होगा
क्या बिखरेगा,क्या टूटेगा
मेरी आँखों का पानी जब
तेरी आँखों से गुजरेगा।
जब विरह-वेदना गूँजेगी
और आँखें गम को सींचेगी
जब एक कुम्भलाया सा चेहरा
रूह को मेरे झगझोड़ेगा।
पूछेगा जब कोई मुझसे
आखिर क्या संताप हुआ।
मुरझाए जो कली अगर
फिर कैसा पश्चाताप हुआ।
नहीं कोई दुविधा मुझे
मैं प्रेम रूप ही जीता हूँ।
पर निज क्षोभ क्रोध मलिन हो
मैं प्रेम प्रमेय को खोता हूँ।
कुत्सित मन मेरा भी है
विरह वेदना की सांकल में।
तोड़ सकूँ लोहे की बेड़ी
नहीं जोर कुंठा संकल में।
पुनः चुनूँ नव पथ को मैं
पुनः तोड़ दूँ सांकल को।
मृतप्राय तरु फिर जी लैं
जल संचित कर लूँ गागर को।
जो तरुवर की फिर छाँव मिले
फिर बिखरा क्या और क्या टूटा।
ज़िद की चौखट लाँघ गए तो
न रब रूठे न मन रूठा।
©युगेश
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| चित्र - गूगल आभार |

As always.. बहतरीन कविता है
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